रिश्वत की रानी

रिश्वत की रानी! धन्य तू, तेरे अगणित नाम,
हक-पानी, उपहार औ, बख्शिश, घूस, इनाम।

बख्शिश, घूस, इनाम, भेंट, नजराना, पगड़ी
तेरे कारण खाऊमल की इनकम तगड़ी।
कहं काका कविराय, दौर-दौरा दिन-दूना,
जहां नहीं तू देवि, महकमा है वह सूना।

जिनको नहीं नसीब थी टूटी-फूटी छान,
आज वहां मना रही कोठी आलीशान।
कोठी आलीशान, भिनकती मुंह पर मक्खी,
उनके घर में घूम रही चांदी की चक्की।

कहं काका कवि, जो रिश्वत का हलवा खाते,
सूखे-पिचके, गाल कचौड़ी-से हो जाते।

हिन्दी बनाम अंग्रेजी

हिन्दी माता को करें, काका कवि डंडौत,
बूढ़ी दादी संस्कृत, भाषाओं का स्त्रोत।
भाषाओं का स्त्रोत कि ‘बारह बहुएँ’ जिसकी
आंख मिला पाए उससे, हिम्मत है किसी?

ईष्या करके ब्रिटेन ने इक दासी भेजी,
सब बहुओं के सिर पर चढ़ बैठी अंगरेजी।
गोरे-चिट्टे-चुलबुले, अंग-प्रत्यंग प्रत्येक,
मालिक लट्टू हो गया, नाक-नक्श को देख।

नाक-नक्श को देख, डिग गई नीयत उसकी,
स्वामी को समझाए, भला हिम्मत है किसकी?
अंगरेजी पटरानी बनकर थिरक रही है,
संस्कृत-हिन्दी, दासी बनकर सिसक रही हैं।

परिचित हैं इस तथ्य से, सभी वर्ग-अपवर्ग,
सास-बहू में मेल हो, घर बन जाए स्वर्ग।
घर बन जाए स्वर्ग, सास की करें हिमायत,
प्रगति करे अवरुद्ध, भला किसकी है ताकत?

किन्तु फिदा दासी पर है, ‘गृहस्वामी’ जब तक,
इस घर से वह नहीं निकल सकती तब तक।